बुधवार 4 नवंबर 2026 - 22:05
अमेरिका की सैन्य हार्ड पावर और अंतरराष्ट्रीय सॉफ्ट पावर में अपूरणीय गिरावट आ चुकी है

इस्लामी क्रांति के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह सय्यद मुजतबा ख़ामेनेई ने वैश्विक साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष के राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर अपने संदेश में ईरान के प्रति अमेरिका की शत्रुतापूर्ण नीतियों और साम्राज्यवादी वर्चस्व की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि ईरानी राष्ट्र का प्रतिरोध, स्वतंत्रता और एकता ही सफलता का आधार है। उन्होंने होर्मुज़ जलडमरूमध्य में ईरान की प्रगति को साम्राज्यवादी शक्तियों के पतन का संकेत बताते हुए “ईरान को और अधिक मज़बूत बनाने” की रणनीति जारी रखने, राष्ट्रीय एकता तथा युवाओं में आशा और आत्मविश्वास को बढ़ावा देने पर ज़ोर दिया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामी क्रांति के सुप्रीम लीडर सय्यद मुजतबा हुसैनी ख़ामेनेई ने वैश्विक साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष के राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर एक महत्त्वपूर्ण संदेश जारी किया है।

संदेश इस प्रकार है:

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

आज वैश्विक साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष का राष्ट्रीय दिवस है। यह वह दिन भी है, जिसमें असत्य के मोर्चे के मुकाबले में सत्य के मोर्चे की लामबंदी और अत्याचारियों के मोर्चे के मुकाबले में मज़लूमों के मोर्चे की लामबंदी के कई महत्त्वपूर्ण पड़ाव एक साथ आ गए हैं। शायद यह कहा जा सकता है कि इस वर्ष 13 आबान (4 नवंबर) को ईरानी राष्ट्र, अपराधी अमेरिका के संबंध में अपनी ज़िम्मेदारी को पिछले सभी वर्षों की तुलना में अधिक स्पष्ट रूप से समझता है। हालांकि, अमेरिका की बढ़ती हुई शत्रुता और उसके मुकाबले में ईरानी राष्ट्र की मज़बूत एकजुटता के कारणों, परिस्थितियों और महत्त्वपूर्ण पड़ावों की समीक्षा करना भविष्य के लिए मार्गदर्शक साबित होगा।

ईरानी राष्ट्र के विरुद्ध अमेरिकी अत्याचार की शुरुआत सात दशक से भी अधिक पुरानी है। उस समय अपने राष्ट्रीय संसाधनों और संपत्तियों, विशेष रूप से तेल की लूट जारी रखने के लिए उसने 19 अगस्त 1953 को तख्तापलट करवाया था। इसके बाद से लेकर इस्लामी क्रांति की सफलता तक का दौर वह समय था, जब अमेरिकी शासकों ने ईरानी राष्ट्र की संपत्तियों को लूटने के लिए हर संभव प्रयास किया। इस उद्देश्य से उन्होंने सवाक (SAVAK) का गठन किया और समाज पर कठोर पुलिसिया वातावरण थोपकर उस समय की अत्याचारी सरकार के हाथों को हर प्रकार के विरोध और आंदोलन को कुचलने के लिए और अधिक खुली छूट दे दी। इस्लामी क्रांति की शानदार सफलता से ठीक पहले भी उन्होंने अपनी कठपुतली सरकार को बचाने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए।

ईरानी राष्ट्र की महान क्रांति की सफलता के बाद भी अमेरिका के शत्रुतापूर्ण कदमों की एक लंबी सूची पेश की जा सकती है। इसमें अलगाववादी गुटों, विद्रोहियों और उन हृदयहीन मुनाफ़िक़ों का समर्थन शामिल है, जो वैज्ञानिक, राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों के साथ-साथ बड़ी संख्या में आम लोगों को भी बेरहमी से शहीद कर रहे थे। इसके अलावा, पहली थोपी गई जंग में बअस पार्टी को प्रत्यक्ष और व्यापक समर्थन देना, यात्री विमान के यात्रियों का नरसंहार, व्यापक, दीर्घकालिक और कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाना, अनेक उपद्रवों की साज़िश रचना और उनका समर्थन करना, उन्हें हथियार उपलब्ध कराना, ईरानी राष्ट्र और उम्मते मुस्लिम के राष्ट्रीय नायक जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या करना, विभिन्न देशों में ईरानी राष्ट्र की संपत्तियों और धन की चोरी करना तथा दूसरी और तीसरी थोपी गई जंगों में प्रत्यक्ष सैन्य आक्रमण करना भी इसमें शामिल है। इन हमलों में बड़ी संख्या में ईरानी विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, कमांडरों और निर्दोष नागरिकों को शहीद किया गया, जिनमें नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक शामिल थे। इनमें सबसे प्रमुख इस्लामी क्रांति के रहबर (अल्लाह उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे) थे।

इन सभी चरणों में अमेरिका के अहंकारी शासक और उनके पिट्ठू हमेशा ईरान पर अपना वर्चस्व स्थापित करने और उसे घुटने टेकने पर मजबूर करने के प्रयास में लगे रहे हैं। इस ज़बरदस्ती की उनकी हालिया कोशिशों में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय शिष्टाचार और दिखावे की झूठी तथा धोखेबाज़ परंपराओं को भी ताक पर रख दिया है। वे खुलेआम ईरान को विभाजित करने, राष्ट्र को घुटने टेकने पर मजबूर करने, व्यवस्था को बिखेरने और ईरान की प्राचीन एवं मौलिक सभ्यता को मिटाने के प्रयास में लगे हैं। लेकिन हर चरण में उन्हें ज़मीनी वास्तविकताओं की मज़बूत दीवार और बहादुर ईरानी राष्ट्र के दृढ़ संकल्प का सामना करना पड़ा है। उनके ग़लत आकलन और साम्राज्यवादी भ्रम की क़ीमत भारी नुकसान के रूप में अमेरिकी जनता और अमेरिका की कठपुतली सरकारों को चुकानी पड़ी है।

ईरान के मुस्लिम राष्ट्र के प्रति अमेरिका की पुरानी शत्रुता और इस दुश्मन के मुकाबले में सभी ईरानियों के साहसपूर्ण प्रतिरोध की कहानी अब इस मुक़ाम पर पहुँच चुकी है कि केवल 4 नवंबर ही नहीं, बल्कि हर दिन और हर पल बड़े शैतान के विरुद्ध प्रतिरोध और संघर्ष का दिन बन गया है।

आज फ़ारस की खाड़ी, विशेष रूप से होर्मुज़ जलडमरूमध्य के मंच ने जिस तरह अमेरिका के अजेय होने की कहानी पर पूर्ण विराम लगा दिया है, उसी तरह उसने उन सरकारों की कमज़ोरी और बेबसी को भी उजागर कर दिया है, जो अपनी जनता को छोड़कर किसी दूसरी शक्ति पर भरोसा करती हैं। साथ ही, अपनी कठपुतली सरकारों की रक्षा के मामले में बड़ी शक्तियों की बेवफ़ाई और असमर्थता भी सामने आ गई है।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान का प्रशासनिक नियंत्रण और क्षेत्र के देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डों का ख़ात्मा, हालांकि तीसरी थोपी गई जंग में अमेरिका की आक्रामकता और अपराधों की प्रतिक्रिया थी, लेकिन इसे क्षेत्रीय स्तर पर साम्राज्यवाद के विरुद्ध एक प्रारंभिक संघर्ष भी कहा जा सकता है, जो दोबारा आक्रमण किए जाने की स्थिति में और अधिक व्यापक रूप धारण कर लेगा।

शक्ति और प्रभुत्व का यह संकेत, सत्य के मोर्चे की विभिन्न चौकियों के बीच एकता और फ़िलिस्तीन तथा लेबनान से लेकर इराक़ और यमन तक प्रतिरोध के मोर्चे की बुद्धिमत्तापूर्ण, दृढ़ और साहसपूर्ण गतिविधियों के साथ मिलकर सत्य के मोर्चे का झंडा बुलंद होने और एक नई विश्व व्यवस्था का मार्ग प्रशस्त होने की उज्ज्वल एवं आशाजनक ख़बर दे रहा है। क्योंकि जब भी सत्य के मोर्चे में अल्लाह पर भरोसा, प्रतिरोध और बलिदान की भावना मौजूद होगी, तो असत्य का मोर्चा, चाहे उसके पास कितनी ही शक्ति और सामर्थ्य क्यों न हो, उसके सामने टिक नहीं सकेगा। उसका अंतिम परिणाम पीछे हटना और पराजय ही होगा। निस्संदेह, असत्य मिटने वाला है।

अल्लाह का शुक्र है कि ईरानी राष्ट्र ने ख़ालिस मुहम्मदी इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम की शिक्षाओं, इस्लामी क्रांति के ज्ञान और अपने बुद्धिमान रहबरों, इमाम ख़ुमैनी और शहीद ख़ामेनेई (अल्लाह उनके दर्जे बुलंद करे) के विचारों से बहुत महत्त्वपूर्ण सबक़ सीखे हैं। ईश्वरीय वादों के लगातार पूरा होने के साथ इस मार्ग की सच्चाई पर उसका विश्वास दिन-ब-दिन और गहरा होता गया है।

आज साम्राज्यवादियों द्वारा स्वयं पैदा की गई बदनामी के परिणामस्वरूप अमेरिका की लगातार गिरती हुई शक्ति और उसका वर्चस्व, सैन्य हार्ड पावर और अंतरराष्ट्रीय सॉफ्ट पावर, दोनों क्षेत्रों में ऐसी गिरावट का सामना कर रहा है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। उसके बिखरने की प्रक्रिया भी तेज़ हो गई है।

यदि अब भी कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें वर्चस्ववादी व्यवस्था के व्यवहार में बदलाव या राजनीतिक दलों और गुटों के बदलने से कोई उम्मीद है, अथवा वे सोचते हैं कि अमेरिका को रियायतें देकर उसे ईरानी राष्ट्र से शत्रुता करने से रोका जा सकता है, तो वे गंभीर ग़लतफ़हमी में हैं। यह ग़लत सोच उन महान विजयों के प्रति कृतघ्नता है, जिन्हें ईरान के मुस्लिम राष्ट्र ने अल्लाह पर भरोसे, प्रतिरोध और संघर्ष के बल पर हासिल किया है।

बड़े शैतान की इच्छा ईरानी राष्ट्र का बिना किसी शर्त के आत्मसमर्पण करवाना है। वर्चस्ववादी दुश्मन के सामने ज़रा-सा भी झुकना उस महान पूँजी को नष्ट कर देगा, जो शहीदों के ख़ून की बरकत और राष्ट्र के बलिदानों से प्राप्त हुई है। इससे साम्राज्यवादी दुश्मन और अधिक रियायतें माँगने तथा भविष्य में युद्ध और आक्रामक कार्रवाइयाँ करने के लिए और अधिक दुस्साहसी हो जाएगा।

पूर्ण प्रतिरोधक क्षमता की स्थिति तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता व्यापक प्रगति के मार्ग पर “ईरान को और अधिक मज़बूत बनाने” की रणनीति जारी रखना है। इस रास्ते में एकजुटता, एकता और सामाजिक समरसता सफलता के बुनियादी तत्व हैं। इन्हें हर व्यक्ति और अधिकारियों के व्यक्तिगत तथा सामूहिक व्यवहार और कथनों पर हावी रहना चाहिए।

इस संबंध में जिस तरह जनता की ओर से अधिकारियों का समर्थन आवश्यक है, उसी तरह अधिकारियों के लिए भी ज़रूरी है कि वे जनता की दोहरी मेहनत और जिहादी भावना के साथ सेवा करते रहें, उसके प्रति ईमानदार रहें और उसकी आर्थिक स्थिति, सुख-सुविधा, भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति, सम्मान तथा स्वतंत्रता को सुनिश्चित करें।

प्रिय ईरान के उज्ज्वल और शानदार भविष्य के निर्माण में सबसे आगे रहने वाला वर्ग हमारे युवा और स्कूलों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी हैं। उन्हें निराशा, मायूसी और “यह संभव नहीं है” के अंधकारमय अड्डे पर लगातार हमला करके उसे ध्वस्त करना चाहिए और “उम्मीद और हम कर सकते हैं” के उज्ज्वल घर के द्वार खोलने का प्रयास करते रहना चाहिए।

इस मिशन के लिए असाधारण परिपक्वता, ज्ञान, तक़वा, कौशल, नैतिकता, संकल्प और असाधारण प्रयास जैसे हथियारों से लैस होना तथा ऊँचे लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए एकजुट होकर आगे बढ़ना आवश्यक है।

आशा है कि अल्लाह तआला की कृपा और हमारे सरदार एवं स्वामी इमाम ज़माना अज्जलल्लाहु तआला फ़रजहुश्शरीफ़ की दुआओं के सदक़े ईरानी राष्ट्र जल्द से जल्द सफलता, सौभाग्य और व्यापक प्रगति हासिल करेगा तथा बड़े शैतान के वर्चस्व के और अधिक एवं तेज़ी से पतन के कारण पैदा होंगे।

“वे इसे बहुत दूर समझते हैं, जबकि हम इसे बहुत निकट देखते हैं।” (सूरह मआरिज, आयत 6-7)

सैयद मुजतबा हुसैनी ख़ामेनेई

4 नवंबर 2026

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